📅 तिथि और शुभ मुहूर्त
- पर्व तिथि: गुरुवार, 13 नवम्बर 2025
- षष्ठी तिथि प्रारंभ: 12 नवम्बर को रात 10:03 बजे
- षष्ठी तिथि समाप्त: 13 नवम्बर को रात 9:20 बजे
(समय दिल्ली के अनुसार है; कृपया अपने स्थान का पंचांग अवश्य देखें।)
🌟 स्कंद षष्ठी का महत्व
स्कंद षष्ठी, जिसे कंद षष्ठी या सूरसम्हारम भी कहा जाता है, भगवान मुरुगन (कार्तिकेय) की पूजा का प्रमुख पर्व है। यह दिन भगवान मुरुगन द्वारा राक्षस सूरपद्मन के वध की स्मृति में मनाया जाता है, जो असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक है।
यह पर्व विशेष रूप से तमिलनाडु और दक्षिण भारत में बड़े उत्साह से मनाया जाता है। भक्तगण इस दिन उपवास रखते हैं, मंदिरों में विशेष पूजा करते हैं और कंद षष्ठी कवचम् का पाठ करते हैं।
🛐 पूजा विधि और परंपराएं
🔅 उपवास और साधना
- छह दिवसीय उपवास: भक्तगण स्कंद षष्ठी से छह दिन पूर्व उपवास प्रारंभ करते हैं, जिसमें केवल फलाहार या एक समय का भोजन करते हैं।
- कवचम् का पाठ: प्रतिदिन कंद षष्ठी कवचम् का पाठ करते हैं, जिससे मानसिक और आत्मिक शुद्धि होती है।
🔅 सूरसम्हारम
- सूरसम्हारम: छठे दिन, भगवान मुरुगन द्वारा सूरपद्मन के वध की नाट्यरूप में प्रस्तुति होती है, जिसे सूरसम्हारम कहा जाता है। यह आयोजन विशेष रूप से तिरुचेंदूर मंदिर में भव्य रूप से होता है।
🔅 तिरुकल्याणम
- तिरुकल्याणम: सूरसम्हारम के अगले दिन, भगवान मुरुगन और देवी देवयानी का दिव्य विवाह (तिरुकल्याणम) मनाया जाता है।
🌿 व्रत के लाभ
- आध्यात्मिक उन्नति: उपवास और साधना से आत्मिक शुद्धि होती है।
- कठिनाइयों से मुक्ति: भगवान मुरुगन की कृपा से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं।
- साहस और शक्ति: भक्तों को मानसिक और शारीरिक बल की प्राप्ति होती है।
📝 निष्कर्ष
स्कंद षष्ठी केवल एक पर्व नहीं, बल्कि आत्मिक जागरण और आत्मशक्ति की प्राप्ति का अवसर है। इस दिन भगवान मुरुगन की पूजा करके हम अपने जीवन में सत्य, साहस और सफलता का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं।